अध्यक्ष 2: पत्थर-फ्रेम वाला द्वार

जब रिया ने अपनी आँखें खोली, तो संसार पूरी तरह से बदल चुका था। हवा ठंडी थी और उसमें खनिजों की महक थी, जो तीव्र और ताजगी से भरी हुई थी। उसने अपने आप को बैठते हुए महसूस किया, जब उसके हाथ चिकनी, काँच जैसी पत्थर की सतह से रगड़े। उसके चारों ओर विशाल क्रिस्टल संरचनाएँ थी, जो आकाश की ओर बढ़ रही थीं, उनका शिखर अंधेरे में गायब हो गया था।

“क्या… हम कहाँ हैं?” मीरा की आवाज़ कांप रही थी, और उसने अपने घुटने को थामते हुए, जिस पर खून की हल्की धार बह रही थी, उसे देखा। किरण उसके पास झुका और उसके घाव का निरीक्षण करने लगा, उसकी सुरक्षा की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से सक्रिय हो गई थी।

रिया ने उन्हें मुश्किल से सुना। उसकी नज़र एक दरवाजे पर थी, जो पूरी तरह से पत्थरों से बना था, जो मशाल की रोशनी में तरल की तरह चमक रहे थे। वह दरवाजा एक विशाल गुफा की दीवार में घुसा हुआ था, और उसकी सतह पर वही चमकते हुए प्रतीक खुदे हुए थे, जो ऊपर दिखाई दिए थे। दरवाजे के पार, धुंधले साए झिलमिला रहे थे, जो गति या जीवन का संकेत दे रहे थे।

“हम जमीन के नीचे हैं,” रिया ने कहा, अपने चक्कराते सिर के बावजूद खड़ी होते हुए। “लेकिन यह कोई गुफा नहीं है, जैसा मैंने कभी देखा है।”

किरण हंसी, हालांकि उसकी आवाज़ में चिंता की झलक थी। “तुम्हें लगता है? क्या ने इसे पहचान लिया? वो चमकते हुए पत्थर या फिर यह कि हम ठोस ज़मीन से गिरकर यहाँ आए हैं?”

मीरा दर्द से खड़ी हो गई। “और ज्यादा समाधान, किरण।”

जब तीनों उस दरवाजे के द्वार के पास खड़े थे, एक हल्की, सुरम्य आवाज़ उनके पास आई। वह न तो पुरुष की थी, न ही महिला की, बल्कि एक मिश्रित स्वर था, जो सीधे उनके कानों को पार कर उनकी मानसिकता में गूंज उठा।

“स्वागत है, सतह के निवासियों,” वह आवाज़ गूंज उठी। “तुमने आह्वान का उत्तर दिया है।”

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